हाँ जानता हूँ,
आम से है बिल्कुल ये सारे ।
ना एहमियत ना कोई वजूद
रह गया है इनका ।
बज़ारो में जिन दोपहरो से नफरत हो चलती है
ऐसे कुतुबखानो में वो आराम करती नज़र आती है।
कुछ अजीब सी अबीरा है इस कमरे की,
नमदो पे गीरती ये दरीचों से छनके आती हुई धूप
उर्दू के शौक़ीन किसी शख्स
को थोड़ा और इश्क़-मिज़ाजी बना देती है ।
फूल-पत्तियों के डिज़ाइन वाला
ये मेज़ का कवर
नानी के घर पे ले जाता है ।
ये लकड़ी की कुर्सी जिस पे बैठने का
किसी को वक़्त नही है अब ।
पुराने जो हो गये है ये,
बिछड़े ज़माने का क़रार कर दिया है इन्हें ।
ता-उम्र की कैद में बंध
ये अलमारियों में उर्दू की किताबो ने चीखना भी छोड़ दिया है अब
की कोई आए और अपने माशूक़ के ज़ुल्फ़
के मानिंद इनके भी सफहो को पलटे कभी ।
हाँ, आजकल
फैंसी कैफे की
रगीन दीवारो पे फैरीलाईत्स,
फ्रेम्ड तस्वीरे
और कुछ कॉफी की चुस्कियां
ज़रूरी हो गई है
लोगों को “कोज़ी” फील करवाने के लिए ।
मगर ये कुर्सी ये मेज़ ये अखबार ये किताबें
इनको ज़रूरत नही ऊपरी सजावट की,
ये शफ़्फ़ाफ़ है सारे ।
तुम आओ ना आओ,
ये ऐसे ही रहेंगे चुप चाप
खामोश
सदियो तक
जैसे रहे है
हमेशा से ।
कुतुबखाना ~ library
नमदो ~ carpets
अबीरा ~ fragrance
शफ़्फ़ाफ़ ~ clear, transparent
मानिंद ~ like
The picture has been taken in Hazrat Pir Mohammed Shah Library located in Pankore Naka, Ahmedabad. The library is the largest in Western India for books on Urdu, Arabic, Persian, Gujarati, Sindhi and Hindi languages. It has got 400 manuscripts and more than 25000 books. Do visit it if you are a shauqeen of Urdu !
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