मैं हर सेहेर वही होता हूँ ।

झील के किनारे
धूप से परेशान उस बेंच को
कुछ देर
अपने जिस्म से छाव देता हूँ ।

कैद हो जाता है
आसमान का अक्स
जहाँ पानी में,
मैं रात के आँसूओ को
वही डूबो आता हूँ ।

खुले आसमान का फ़िज़ा से
ना जाने क्या राबता है ?
मैं परिंदो की सदाओ में
शाम तक की उम्मीदें
बटोर लाता हूँ ।

तुम्हे याद है ?
मैं बताया करता था
इस जगह के बारे तुम्हे ।

तुमसे गुफ्तगू की खुशी में
ये अंदाज़ा ही ना रहा
एक दिन यूँ ही यहाँ
अकेले भी रहना होगा ।

सोचता हूँ शायद
तुम्हे याद ही होगा,
इसी उम्मीद में मैं
हर सेहेर वही होता हूँ  ।

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