अबंडण्ड़

किसी शाम की तलाश में हूँ मैं

एक जानी पहचानी सी जगह है
शायद वही वो छिप के बैठी है ।
छिप के नहीं बैठी
उसे तो बल्कि इंतज़ार है मेरा…
कि मैं कब आऊँ वहां !

जाने को तो अभी चले जाऊँ
पर नहीं..
अभी गए तो सिर्फ दिवारों को महसूस करेंगे
चलो, एक सैर भी लगा आ सकता हूँ..
पर उस से क्या ?
मुझे सिर्फ दीवारों की सतह नहीं
उन दिवारों पे धूप के उस
रोशनी और छाँव के
खेल को भी तो देखना है !

पर उन सब को तब ही
देख पाएँगे ना
जब वो! होंगे पास

कुछ किलकारीयाँ होंगी
बच्चों सी ।
कोई हँसी भी होगी शरमाई सी !
कुछ ज़ूल्फें उतर आएँगी चेहरे पे तब
मेरे ही झुमकों को देखूँगा
मुझसे ही करते हुए बगावत तब,
इसीलिए की कह रहे होंगे
मेरे ही राज़ उन से सब ।
कुछ खामोशी भी तो
ज़रूरी होगी फिर
लब़ यूँ भी कितना कहेंगे सोच सोच के ।
कुछ आँखों को भी तो बोलने दिया जाएगा
दिल से ।

बस..
सब सब थम जाएगा फिर ।

मगर मानो तो वो थमना नहीं है..
अब सब कुछ फिर से जुड़ के
एक होना चाहता हो जैसे ।
लब़ खुले भी अगर तो
किसी वादे के लिए खुले ।
कोई वादा नहीं तो कोई
कबूलियत ही सही ।
वो भी खूब होगी !

पर जाना है वहां
वहीं !
बिलकुल  वहीं…
मेरे वतन के खेतों में
रेल की पटरी के पास
उस “अबंडण्ड” लिख दिए गए

खंड़हर में ।

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3 thoughts on “अबंडण्ड़

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